Tuesday, September 30, 2008

अन्नपूर्णास्तोत्रम् (लिखित एवं वाचन)

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी 
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी । 
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥1॥ 

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी 
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भांतरी । 
काश्मीरागरुवासिताङगरुचिरे  काशीपुराधीश्वरी  
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥2 ॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी 
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी । 
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥3॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी 
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी । 
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥4॥ 

दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी 
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी । 
श्री विश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥5॥ 

उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी 
वेणीनीलसमानकुंतलहरी नित्यान्नदानेश्वरी । 
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥6॥ 

आदिक्षांतसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी 
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी । 
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥7॥ 

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी 
वामं स्वादु पयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी । 
भक्ताभिष्टकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥8॥ 

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी 
चन्द्रार्काग्निसमानकुंतलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी । 
मालापुस्तकपाश्साङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥9॥ 

क्षत्रत्राणकरी महाभवकरी माता कृपासागरी 
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥10॥ 

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे । 
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥11॥ 

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः । 
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥12॥ 

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ अन्नपूर्णास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥